अल्सायी सी मै
अल्सायी सी दिन और अल्सायी यें रात कुछ मौसम अल्साया सा कुछ अल्सायी मै, कुछ सोए और कुछ जागे ये फुरसत के पल, जिए इस पल को कुछ ऐसे की पता ना चले कि सोए है या जागे,या बस कल्पना है, पता हो बस इतना कि आज अलसाई सी मै हूं। अल्साए इस पल में,धुंधली यादों का यूं आना, वो यादों का आना और आ कर जम यूं जाना, लगा यूं की मिट्टी पे पड़े अल्साये पत्तों पर जैसे, सावन कि फुहारों का मचल कर आ जाना । ये आलास के पल इतने बदनाम जाने क्यूं है, अलास का मजा एक आलसी से पूछो, जो मिल जाए आलस और यादें पुरानी, तो ये मजा सावन के बारिश में भी कहा है । हां रुलाती भी है ये आलस और यादें, पर सावन बिना पानी के भाती भी कहां है, फिर यादों में भीगने का मजा ही अलग, यूं अल्साई लम्हों की खुशबू ही अलग है।