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DAAG

ज़िन्दगी यूँ भी चल रही थी ,हमारी ,दाग जरुरी था क्या सब रब की मर्जी है तो ,तुम्हारा होना भी जरुरी था क्या न होते गर तुम उस राह पर, जिस राह पे हम चल रहे थे फिर किसी और अनजाने राह पे यूँ ही हम मिलते क्या न मिलते गर किसी भी मोड़ पर तो क्या बदल जाता हम हम ही होते तुम तुम ही होते बस ये दाग ना होता 

मीठी

पौष के महीने मे वो , आयी घर मे फ़ागुन सी , नन्ही सी नखरीली सी ,कोमल नाजुक वो फूलों  सी , नाम से तो वो मीठी थी ,पर थी वो थोड़ी तीखी सी, नाक थी उसकी छोटी सी,जैसे वो गुस्से मे आयी हो, हँसी थी उसकी प्यारी सी,आँगन मे खुशबू लाई थी, नाम से तो वो मीठी थी ,पर थी वो थोड़ी तीखी सी, नन्ही सी मीठी जाने कब हो गयी बड़ी सी है वैसे तो हूँ मासी उसकी ,जाने क्यों लगती सखी सी है , समझाती हमें  बातें बड़ी ,लगती बड़ी सायानी सी  , नाम से अब भी मीठी है , है अब भी थोड़ी तीखी सी, खुले गगन मे राज करे ,उड़ान भरे वह पँछी सी, हर हार को जीत दिला दे वो ,चमक रहे आफ़ताब सी, मीठी रहे या तीखी रहे वो, सदा रहे उन्मुक्त  सी प्यार है उसको सखियों से ,तो सखी मैं उसकी बन जाऊ, गर शौक है उसको खेल का ,तो खेल मैं उसका बन जाऊ, घर दूर दूर है बहुत हमारे ,पर दिल आस पास ही मडराये, प्यार से सबने मीठी पुकारा ,वो आज भी देखो मीठी है, नाम से तो वो मीठी थी ,पर है अब भी थोड़ी तीखी सी,