मीठी

पौष के महीने मे वो , आयी घर मे फ़ागुन सी ,
नन्ही सी नखरीली सी ,कोमल नाजुक वो फूलों  सी ,
नाम से तो वो मीठी थी ,पर थी वो थोड़ी तीखी सी,

नाक थी उसकी छोटी सी,जैसे वो गुस्से मे आयी हो,
हँसी थी उसकी प्यारी सी,आँगन मे खुशबू लाई थी,
नाम से तो वो मीठी थी ,पर थी वो थोड़ी तीखी सी,

नन्ही सी मीठी जाने कब हो गयी बड़ी सी है
वैसे तो हूँ मासी उसकी ,जाने क्यों लगती सखी सी है ,
समझाती हमें  बातें बड़ी ,लगती बड़ी सायानी सी  ,
नाम से अब भी मीठी है , है अब भी थोड़ी तीखी सी,

खुले गगन मे राज करे ,उड़ान भरे वह पँछी सी,
हर हार को जीत दिला दे वो ,चमक रहे आफ़ताब सी,
मीठी रहे या तीखी रहे वो, सदा रहे उन्मुक्त  सी

प्यार है उसको सखियों से ,तो सखी मैं उसकी बन जाऊ,
गर शौक है उसको खेल का ,तो खेल मैं उसका बन जाऊ,
घर दूर दूर है बहुत हमारे ,पर दिल आस पास ही मडराये,

प्यार से सबने मीठी पुकारा ,वो आज भी देखो मीठी है,
नाम से तो वो मीठी थी ,पर है अब भी थोड़ी तीखी सी,







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