तड़प

सुनसान सी दोपहर और खाली सड़कें,
खाली सड़कें और खाली दूरे दरवाज़ें
दरवाजों से आती पहचानी सी आवाजें

आवाजें या एक हंसी है शायद
तरस खाती और खुद पे इतराती
सुनसान तुम भी सुनसान हम भी
तरसते तुम भी तरसते हम भी

पर फर्क तो फिर भी है हम तुम में
खुद को खोजते इन गलियों में आते हो
हम को तो तुम यूं ही मिल जाते हो
सुनसान होकर भी हम आदत है तुम्हारी
हमारी गलियां तुम बिन भी आबाद है ।




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